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  • तबलीग़ पर जोर: वैचारिक शिक्षा से लेकर संगठनात्मक गतिविधियों तक

    तबलीग़ पर जोर: वैचारिक शिक्षा से लेकर संगठनात्मक गतिविधियों तक

    बहाई धर्म के आंतरिक साहित्य और दस्तावेजों के अध्ययन से पता चलता है कि इस आंदोलन में प्रचार की गतिविधि केवल एक धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह विशेष रूप से ईरान पर ध्यान केंद्रित करने वाली एक संगठनात्मक परियोजना में बदल गई है। इस दृष्टिकोण में आध्यात्मिक शब्दावली और आभासी संपर्कों के माध्यम से सामाजिक सोच में बदलाव की जमीन तैयार करने का प्रयास किया जाता है। इसलिए इस विषय का वैज्ञानिक और दस्तावेज़ी अध्ययन करना और भी आवश्यक हो जाता है।

  • इस्लाम में चिंतन-मनन का महत्व और मानव जीवन पर इसके प्रभाव

    इस्लाम में चिंतन-मनन का महत्व और मानव जीवन पर इसके प्रभाव

    यदि इस्लामी दृष्टिकोण से चिंतन-मनन के महत्व का जायजा लिया जाए तो पता चलता है कि अल्लाह की पहचान और उसकी विशेषताओं को समझना, संसार की व्यवस्था पर विचार किए बिना संभव नहीं है। जब तक इंसान इस सवाल पर विचार नहीं करता कि उसका मूल और शुरुआत क्या है, उसे कहां लौटकर जाना है और उसे इस दुनिया में किस उद्देश्य से भेजा गया है, तब तक वह अपनी सृष्टि के वास्तविक उद्देश्यों से अनजान रहता है और एक उद्देश्यहीन जीवन बिताता है।

  • रिसालत का अपमान: क्या पैगंबर के इतने बड़े आदेश की अवहेलना गुनाह और अपमान नहीं?

    रिसालत का अपमान: क्या पैगंबर के इतने बड़े आदेश की अवहेलना गुनाह और अपमान नहीं?

    घटना-ए-क़िरतास व क़लम उस समय हुई, जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि अपने जीवन के अंतिम दिनों में थे। आपने अपने पास मौजूद लोगों से कहा कि मेरे लिए लिखने का सामान लाओ, मैं तुम्हारे लिए ऐसी लिखित बात लिख दूंगा, जिसके बाद तुम कभी गुमराह नहीं होगे।

  • कल सिफ़्फ़ीन में क़ुरआन को नेज़ों पर उठाया गया था, आज मक्का और मदीना का नाम सामने है

    कल सिफ़्फ़ीन में क़ुरआन को नेज़ों पर उठाया गया था, आज मक्का और मदीना का नाम सामने है

    पवित्र नाम लेना और पवित्र उद्देश्य के लिए खड़ा होना, दोनों एक बात नहीं हैं। सिफ़्फ़ीन में क़ुरआन को नेज़ों पर उठाया गया था; आज मक्का और मदीना का नाम सामने है। समय बदल गया, लेकिन भावनाओं को इस्तेमाल करने का तरीका नहीं बदला।

  • सुबह-ए-अज़ल कौन था और अज़ली संप्रदाय कैसे अस्तित्व में आया?

    सुबह-ए-अज़ल कौन था और अज़ली संप्रदाय कैसे अस्तित्व में आया?

    बाबीयत के इतिहास में सुबह-ए-अज़ल एक महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। बाब की मृत्यु के बाद बाबी आंदोलन के नेतृत्व और बाद में अज़ली और बहाई समूहों के विभाजन के संदर्भ में उनका नाम सामने आता है।

  • हज़रत आदम और हव्वा दो थे तो आज चार ब्लड ग्रुप कैसे हैं?

    हज़रत आदम और हव्वा दो थे तो आज चार ब्लड ग्रुप कैसे हैं?

    सोशल मीडिया पर कभी-कभी यह सवाल उठाया जाता है कि अगर मानव जाति की शुरुआत हज़रत आदम और हज़रत हव्वा से हुई थी, तो आज इंसानों में A, B, AB और O जैसे अलग-अलग ब्लड ग्रुप कैसे पाए जाते हैं? इस सवाल का जवाब आनुवंशिकी के आधार पर समझा जा सकता है।

  • रहबर-ए-शहीद: एक चिराग़ जो बुझा नहीं छः माह गुज़र गए...

    रहबर-ए-शहीद: एक चिराग़ जो बुझा नहीं छः माह गुज़र गए...

    छः माह पहले एक ख़बर ने दिलों को हिला दिया था। एक ऐसा नाम, जो बरसों से मुज़ाहमत, इस्तिक़ामत, बसीरत और ख़ुद्दारी के साथ जुड़ा हुआ था, हमारे दरमियान अपने ज़ाहिरी वुजूद के साथ मौजूद न रहा। आँखें अश्कबार हुईं, दिलों में एक ख़ला पैदा हुआ, मजालिस हुईं, ताज़ियती इज्तिमाआत हुए, तक़ारीर हुईं, नारे बुलंद हुए और अक़ीदतमंदों ने अपने-अपने अंदाज़ में अपने रहबर से मोहब्बत का इज़हार किया।

  • कुरआन का नुस्खा: आर्थिक परेशानियों को दूर करने और जीवन में खुशहाली लाने के उपाय

    कुरआन का नुस्खा: आर्थिक परेशानियों को दूर करने और जीवन में खुशहाली लाने के उपाय

    कभी-कभी समाज के लोग और जिम्मेदार अधिकारी, जो सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के तरीकों को लेकर चिंतित रहते हैं, खुद को रुकावटों, प्रतिबंधों और दुश्मनी के बीच घिरा हुआ महसूस करते हैं। कई बार यही स्थिति उनके प्रशासन और जिम्मेदारियों को निभाने में अस्थिरता का कारण बन जाती है। जबकि इस संसार के सृष्टिकर्ता और उपास्य ने इसका एक उपचार प्रस्तुत किया है।

  • माहे रबीउस् सानी की अहम मुनासेबतें

    माहे रबीउस् सानी की अहम मुनासेबतें

    हौज़ा / माहे रबीउस् सानी के महीने में बहुत सारी मुनासिबतें है जो आपकी खिदमत में पेश की जा रही है

  • यमन से हुर्मुज स्ट्रेट तक: मुस्लिम दुनिया किसके हित के लिए युद्ध लड़ रही है?

    यमन से हुर्मुज स्ट्रेट तक: मुस्लिम दुनिया किसके हित के लिए युद्ध लड़ रही है?

    मध्य पूर्व एक बार फिर ऐसे खतरनाक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ एक छोटी-सी चिंगारी पूरे क्षेत्र को युद्ध की आग में धकेल सकती है। यमन में अंसारुल्लाह की बढ़ती ताकत, बाब अल-मंदब का महत्व, होर्मुज़ जलडमरूमध्य की संवेदनशील स्थिति और सऊदी अरब की यमन में फिर से दखलंदाजी ने हमारे सामने एक महत्वपूर्ण सवाल पूरी गंभीरता के साथ खड़ा कर दिया है: क्या मुस्लिम देश अपना युद्ध खुद लड़ रहे हैं या किसी और के हितों के लिए एक-दूसरे के खिलाफ खड़े किए जा रहे हैं?

  • ब्रिक्स सम्मेलन और ईरानी राष्ट्रपति की भारत यात्रा, ईरान और भारत के पुराने संबंधों का एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक चरण

    ब्रिक्स सम्मेलन और ईरानी राष्ट्रपति की भारत यात्रा, ईरान और भारत के पुराने संबंधों का एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक चरण

    नई दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन के अवसर पर ईरान के राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेज़ेश्कियान की भारत यात्रा एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटना है। इस यात्रा को केवल एक औपचारिक मुलाकात या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भागीदारी तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे ईरान और भारत के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक संबंधों की लंबी परंपरा भी है और बदलती हुई वैश्विक राजनीति की नई आवश्यकताएँ भी।

  • अंसारुल्लाह की प्रगति: प्रतिरोधी मोर्चे का करिश्मा और ईरान की सफलताओं का ततिम्मा

    अंसारुल्लाह की प्रगति: प्रतिरोधी मोर्चे का करिश्मा और ईरान की सफलताओं का ततिम्मा

    अगर आज हुर्मुज़ स्ट्रेट और बाब अल-मंदब की बात की जाए, तो क्षेत्रीय शक्ति के समीकरण में दोनों की निर्णायक भूमिका है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य में ईरान के पास दबाव बनाने का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साधन है, जबकि अंसारुल्लाह आंदोलन भी बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य में ऐसी स्थिति तक पहुंच चुका है कि इस जलमार्ग के यमनी हिस्से पर उसका प्रभावी नियंत्रण है।

  • अल्लाह के शेरों को लोमड़ी जैसी चालाकी नहीं आती

    अल्लाह के शेरों को लोमड़ी जैसी चालाकी नहीं आती

    इतिहास इस बात का गवाह है कि मानव जीवन की शुरुआत से ही सत्य और असत्य, प्रकाश और अंधकार तथा उजाले और अंधेरे के बीच संघर्ष होता आया है। हत्यारे और मारे गए, अत्याचारी और पीड़ित की नस्ली और वैचारिक लकीरें इतिहास की हथेली पर हमेशा साथ-साथ चलती रही हैं और समय-समय पर एक-दूसरे को काटती रही हैं।

  • धर्म की व्याख्या में इफ़रात और तफ़रीत के खतरो पर सिरात से भी पतला मार्ग

    धर्म की व्याख्या में इफ़रात और तफ़रीत के खतरो पर सिरात से भी पतला मार्ग

    धर्म के पालन और धार्मिक विषयों पर विचार व्यक्त करने के दौरान इफ़रात और तफ़रीत से बचना तथा संतुलन बनाए रखना हमेशा एक महत्वपूर्ण चुनौती रही है। धार्मिक ग्रंथों में ‘सिरात’ को बाल से भी पतली राह के रूप में बताया गया है, ताकि संतुलन बनाए रखने की कठिनाई को स्पष्ट किया जा सके।

  • जीवनसाथी का दिल कैसे खुश रखें? / वैवाहिक संबंध को बेहतर बनाने के पाँच सुनहरे सिद्धांत

    जीवनसाथी का दिल कैसे खुश रखें? / वैवाहिक संबंध को बेहतर बनाने के पाँच सुनहरे सिद्धांत

    परिवार के मामलों के सलाहकार और विशेषज्ञ हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन रज़ा यूसुफ़ज़ादेह ने अपनी बातचीत के दौरान जीवनसाथी को उचित समय देना, उसकी बात ध्यान से सुनना, सहानुभूति और हमदर्दी का एहसास, उसकी कद्र करना और प्यार का स्पष्ट एवं अलग-अलग तरीकों से इज़हार करने जैसी पाँच बुनियादी बातों को समझाया। उन्होंने पति-पत्नी के बीच भावनात्मक खुशी और आपसी लगाव को बढ़ाने के व्यावहारिक तरीके भी बताए।

  • अल्लाह के डर से पाप छोड़ने का इनाम

    दिन की हदीसः

    अल्लाह के डर से पाप छोड़ने का इनाम

    हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) ने एक हदीस में अल्लाह के डर से पाप छोड़ने के इनाम की ओर संकेत किया है।

  • मध्य पूर्व का त्रासदीपूर्ण संकट: फिलिस्तीनियों का समर्थन करने वालों को सजा क्यों दी जा रही है?

    मध्य पूर्व का त्रासदीपूर्ण संकट: फिलिस्तीनियों का समर्थन करने वालों को सजा क्यों दी जा रही है?

    कुछ दिन पहले यमन के हूतियों पर इज़राइल और अमेरिका के संयुक्त हमले ने एक बार फिर साबित कर दिया कि पश्चिमी साम्राज्यवाद और ज़ायोनी शासन के लिए कोई नैतिक सीमा नहीं है। इन हमलों का उद्देश्य इसके अलावा कुछ और नहीं था कि यह संदेश दिया जाए कि जो भी फिलिस्तीनियों के पक्ष में आवाज उठाएगा, उसे कुचल दिया जाएगा। लेकिन क्या वास्तव में हूतियों ने कोई गलती की थी? क्या गाज़ा के बच्चों, भूखी माताओं और बेघर परिवारों की मदद करना अपराध है? अगर यह अपराध है, तो आज मानवता को स्वयं पर शर्म आनी चाहिए।

  • क्या कुरआन ने गुनहगार महिलाओं को मौत तक कैद करने को कहा है?

    क्या कुरआन ने गुनहगार महिलाओं को मौत तक कैद करने को कहा है?

    सूर ए निसा की आयत 15 और 16 उन आयतों में शामिल हैं, जिन्हें पहली नजर में पढ़ने पर यह सवाल उठता है कि किसी गलत काम और उसकी सजा के बारे में कुरआन का तरीका क्या है। खास तौर पर वहां, जहां महिलाओं को मौत आने तक घरों में रोकने और उन्हें “तकलीफ देने” की बात कही गई है। पहली नजर में इन शब्दों से कुरआन के आदेश की कैसी तस्वीर सामने आती है और वास्तविक मामला क्या है?

  • ईरान का प्रतिरोध और अमेरिका की बेबसी!

    ईरान का प्रतिरोध और अमेरिका की बेबसी!

    जब दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति किसी देश पर हमला करती है, तो आमतौर पर यह दावा भी किया जाता है कि दुश्मन की सैन्य शक्ति को कुछ ही दिनों में खत्म कर दिया जाएगा, उसे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया जाएगा और युद्ध को मनचाहे परिणाम तक पहुंचा दिया जाएगा। ईरान के मामले में भी कुछ ऐसा ही अनुमान लगाया गया था।

  • अज़ादारी और मरजइयत: शिया संप्रदाय के दो मजबूत बाज़ू

    अज़ादारी और मरजइयत: शिया संप्रदाय के दो मजबूत बाज़ू

    मानव इतिहास में कुछ आंदोलन समय के साथ कमजोर पड़ जाते हैं, कुछ विचार किताबों के पन्नों में दफन हो जाते हैं और कुछ हस्तियाँ अपने दौर के समाप्त होने के साथ इतिहास का हिस्सा बन जाती हैं। लेकिन कुछ सच्चाइयाँ ऐसी होती हैं, जो समय के साथ पुरानी नहीं होतीं, बल्कि हर नए दौर में नई जागरूकता के साथ जीवित रहती हैं। शिया धर्म भी ऐसी ही एक जीवंत सच्चाई है, जिसकी नींव केवल विचारों पर नहीं, बल्कि खून, चेतना, बलिदान, प्रेम और लगातार वैचारिक मार्गदर्शन पर आधारित है।

  • उफ़ुक़-ए-इल्म पर एक आफ़्ताब तुलूअ हुआ

    उफ़ुक़-ए-इल्म पर एक आफ़्ताब तुलूअ हुआ

    ख़ामेनेई की विलादत-ए-बासआदत के मौक़े पर दिल की गहराइयों से तबरीक़ व तहनीअत पेश करते हैं; ऐसी मुबारकबाद जिसमें अल्फ़ाज़ से ज़्यादा अक़ीदत, इबारत से ज़्यादा इख़लास और रस्म से ज़्यादा दिल की आवाज़ शामिल है।

  • मुसलमानों से एक सवाल; 33 साल बनाम 3 साल, हदीसों में यह अंतर क्यों?

    मुसलमानों से एक सवाल; 33 साल बनाम 3 साल, हदीसों में यह अंतर क्यों?

    रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि की हदीसें हमारे धर्म की महत्वपूर्ण पूंजी हैं। इसलिए इस्लाम के इतिहास को समझने वाले हर व्यक्ति के सामने एक सवाल जरूर आना चाहिए।

  • अगर पैग़म्बरे अकरम (स) उम्मी थे, तो हज़रत ख़दीजा (स) ने अपने व्यापारिक काफ़िले का प्रबंधन उन्हें कैसे सौंपा?

    अगर पैग़म्बरे अकरम (स) उम्मी थे, तो हज़रत ख़दीजा (स) ने अपने व्यापारिक काफ़िले का प्रबंधन उन्हें कैसे सौंपा?

    “पैग़म्बर उम्मी थे”—इस कथन का वास्तव में क्या अर्थ है? अगर “उम्मी” का अर्थ पढ़ने-लिखने से अनजान होना माना जाए, तो पैग़म्बरे अकरम (स) के व्यापार और हज़रत ख़दीजा (स) द्वारा उन पर किए गए भरोसे का मामला विचार करने योग्य कई पहलू अपने अंदर रखता है।

  • यमन पर ही हमले क्यों?

    यमन पर ही हमले क्यों?

    यमन के हूतियों को आज जिस तरह लगातार निशाना बनाया जा रहा है, उसके पीछे एक मूल तथ्य को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। उन्होंने ग़ज़ा के पीड़ित फ़िलिस्तीनियों के समर्थन में इज़राइल के खिलाफ़ व्यावहारिक मोर्चा खोला था। जब ग़ज़ा में फ़िलिस्तीनियों का नरसंहार जारी था, इज़राइली बमबारी से घर, स्कूल, अस्पताल और बस्तियाँ नष्ट हो रही थीं और हज़ारों निर्दोष फ़िलिस्तीनी अपनी जान गँवा रहे थे, उस समय दुनिया की अधिकांश बड़ी शक्तियाँ इज़राइल के साथ खड़ी थीं।

  • इमाम जमाअत की ज़िम्मेदारी

    दिन की हदीसः

    इमाम जमाअत की ज़िम्मेदारी

    इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) ने एक रिवायत में नमाज़ के दौरान इमाम-ए-जमाअत को नमाज़ पढ़ने वालों की स्थिति और उनकी क्षमता का ध्यान रखने की हिदायत दी है।

  • बातिल को दीमक चाट जाती है या ज़ंग लग जाता है, अमेरीका युद्धपोत का अंजाम

    बातिल को दीमक चाट जाती है या ज़ंग लग जाता है, अमेरीका युद्धपोत का अंजाम

    ज़ंग लगा हुआ अमेरिकी नौसैनिक बेड़ा अब्राहम लिंकन थाईलैंड के तट पर लंगर डाले हुए है। यह एक पुराने और खोखले बातिल निज़ाम की स्पष्ट निशानी दिखाई दे रहा है। एक ऐसा जंग लगा हुआ नौसैनिक बेड़ा, जिसके चालक दल के चेहरों की रौनक भी 286 दिनों के नसों को तोड़ देने वाले डर ने पूरी तरह खत्म कर दी है।

  • हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) के क़ुम प्रवास का रणनीतिक अध्ययन

    हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) के क़ुम प्रवास का रणनीतिक अध्ययन

    हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) के मदीना से क़ुम प्रवास को ऐतिहासिक दृष्टि से देखने पर इस यात्रा को केवल भावनात्मक कदम नहीं माना जा सकता। अब्बासी दौर के राजनीतिक माहौल में उनका कारवां इमामत से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संदेश लेकर आगे बढ़ा और क़ुम की शिया संस्कृति में एक स्थायी परिवर्तन की शुरुआत का कारण बना।

  • 23 रबीउल अव्वल; करीमा-ए-अहलेबैत का हरम-ए-अहलेबैत में आगमन

    23 रबीउल अव्वल; करीमा-ए-अहलेबैत का हरम-ए-अहलेबैत में आगमन

    हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा का क़ुम आगमन क़ुम के आध्यात्मिक इतिहास में एक बहुत बड़ा पड़ाव है, लेकिन क़ुम की विद्वतापूर्ण पहचान उनके आगमन से पहले ही स्थापित हो चुकी थी। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के सहाबी और शिष्य जनाब ईसा बिन अब्दुल्लाह अशअरी क़ुम्मी जैसे विद्वान और हदीस के जानकार इस शहर में मौजूद थे। अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के इमामों के समय में ही क़ुम हदीस, रिवायत, फ़िक़्ह और धार्मिक ज्ञान के महत्वपूर्ण केंद्रों में शामिल हो गया था।